Friday, August 2, 2019

सीसीडी के फाउंडर ख़ुद को मरने से बचा सकते थे.


देश भर के कैफ़े कॉफ़ी डे को दो दिनों के लिए बंद कर दिया गया है.हिंदुस्तान का सबसे पहला कॉफ़ी चेन सीसीडी है.बहुत कम वक़्त में महानगरों से छोटे शहरों तक इसका पहुँच जाना उस नौजवान पीढ़ी की वजह से ही मुमकिन हो पाया है जिसने आर्थिक उदारीकरण के बाद इस बदलते देश में सपने देखे हैं और उसको जीने की कोशिश में उन तमाम चीज़ों को अपनाना शुरू किया जिसे वह अपना स्टेटस सिंबल समझते हैं.पिछले दो दिनों से सीसीडी के फाउंडर वी जी सिद्धार्थ लापता थे और आज सुबह उनकी लाश मिली है.मीडिया रिपोर्टों में ये बतया जा रहा है कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से उनको लगातार परेशान किया जा रहा था.दो दिन पहले उन्होंने अपने बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स को एक चिट्ठी भी लिखी थी जिसमें उन्होंने इस बिज़नस को प्रोफिट में नहीं ला पाने की ज़िम्मेदारी को क़बूल किया था.हालाँकि बिज़नस टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कॉफ़ी डे एंटरप्राइज के पास 18000 करोड़ से ज़्यादा की संपत्ति है और सीसीडी को चलने वाली कंपनी कॉफ़ी डे ग्लोबल लिमिटेड के पास 5400 वेंडिंग मशीन के साथ 1600 स्टोर है वहीँ 500 एक्सप्रेस स्टोर है.

आख़िर बिज़नस का ये कौन सा मॉडल है जो लगातार नाकाम हो रहा है,कंपनियों के बंद होने से हजारों लाखों लोग बेकार हो रहे हैं.जिंदगियां तबाह हो रही है,फिर ये कौन सा न्यू इंडिया दिखाया जा रहा है.देश के किसी भी सीसीडी में चले जायें,वहां बैठे लोगों को देख कर आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं कि इस देश में बेरोज़गारी या महंगाई कोई बड़ी समस्या है.सीसीड के हर टेबल पर घंटों बैठ कर गप्पें मार रहे लोगों के पास पैसा भी होता है और वक़्त भी.दिल्ली के सबसे व्यस्त मेट्रो स्टेशन या मुंबई के अँधेरी वेस्ट और फोर्ट के किसी भी सीसीडी में कभी भी जाएँ,आपको सारे टेबल भरे नज़र आएंगे.नयी पीढ़ी के लिए ऐसे किसी भी कॉफ़ी शॉप में बैठना उसके स्टेटस का मामला है.
इस वक़्त पूरा देश वि जी सिदार्थ की मौत पर न सिर्फ दुखी है बल्कि हैरान भी है.पुलिस और रेस्क्यू के लोगों को सिदार्थ की लाश कर्नाटका की एक ()नदी में मिली है.वी जी सिदार्थ बहुत नेक इंसान के तौर पर जाने जाते थे.एक बार दिल्ली एअरपोर्ट पर अपनी फ्लाइट का वेट करते हुए पत्रकार डी पी सतीश को उन्होंने बताया था कि जब भी उनकी फ्लाइट डिले होती है वह lounge में बैठना पसंद नहीं करते हैं बल्कि इकॉनमी क्लास में आम लोगों के साथ रहते हैं,उसु दिन वक़्त काटने के लिए उन्होंने ख़ुद लाइन में लग कर सीसीडी से दो कॉफ़ी लिया था,उस स्टोर के स्टाफ को नहीं पता था की वह अपने मालिक को ही कॉफ़ी बेच रहा है.
वि जी सिदार्थ शायद अपनी कंपनी के उस स्लोगन को ठीक से समझ नहीं पाए जो उनके हर स्टोर में लिखा रहता है.A lot can happen over coffee.
अगर वह इस छोटी सी लाइन को समझ लेते तो ख़ुद को मरने से बचा सकते थे
ज़िन्दगी में चाहे कितना भी कठोर समय आ जाये,ठहर कर बैठ कर सोचने से ज़िन्दगी को बचाया जा सकता है.



Thursday, August 2, 2018

कहानी को भूल जाना चाहिए

(ये कहानी हर उस इंसान की है जिसने अपने वजूद का लंबा सफर तय किया है और करता रहेगा.)

ज़माना गुज़र गया और उन बीत गये सालों में कभी कभी ऐसा वक़्त भी आया की एक पल में न जाने कितनी कहानियां लिख दी गयी.पीछे लौट कर जाना कौन चाहता है और अगर वापस जा कर कहानी लिखने वालों को कोई एक सिरा पकड़ में आ भी जाता है तो क्या हो जायेगा.वक़्त की अपनी एक शक्ल होती है जो हमारी ज़िन्दगी के आईने में झाँक कर मुस्कुराता है,उसी मुस्कुराहट की रौशनी में हमारी आँखों का अँधेरा गुम हो जाता है.हालांकि उस रौशनी के झमाके में आँखों का दिया तो रोशन हो जाता है लेकिन अपना वजूद बहुत सारी लकीरों में बंट कर कई सिम्तों में बिखर जाता है.

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सर्द मौसम में अलाव जलाया जाता था,बच्चे ने इस बात पर इतनी ज़ोर का क़हक़हा लगया की बूढ़े सख्स ने उसे बहुत ध्यान से देखा और ये समझने की कोशिश कर ही रहा था की आखिर बच्चे को हंसी क्यों आई कि उसकी माँ आ गयी.बच्चा अभी अभी स्कूल से आया था और अपने बैग से पानी की बोतल निकाल कर पीना ही चाहता था.बच्चा अपनी माँ के साथ चला गया और बुढा सख्स उसे तब तक जाते हुए देखता रहा जब तक बच्चे की धुंधली काया एक पतली सी लकीर में नहीं बदली.
बुढा खामोश हुआ तो हॉल में रौशनी के तमाम बल्ब रोशन हो गए.बूढ़े ने देखा हॉल में एक भी सीट ख़ाली नहीं थी.पानी का एक ग्लास बूढ़े के बिलकूल सामने था,बूढ़े ने पानी पिया और अपनी आँखें बंद कर के कहानी याद करने लगा.आजकल बुढा सख्स कहानी भूल जाता था,कई बार तो उसे अच्छा भी लगता था कि चलो अब सब कुछ भूल ही जाना चाहिए.इस वक़्त भी बूढ़े को ये अच्छा लग रहा था.
अरे क्या हुआ
कहानी सुनाओ!

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हॉल में एक शोर हुआ और बूढ़े के सर के ठीक पीछे एक बल्ब रोशन हुआ.इस बल्ब को उस वक्त ही रोशन किया जाता था जब दास्तानगो कहानी कहते कहते रुक जाता था.कई बार बूढ़े को बहुत हंसी आती थी,दास्तानगो को पता था इस बल्ब की रौशनी में पीछे जा कर कहानी को तलाश करना नामुमकिन है.
बल्ब ऑफ हुआ और बूढ़े ने कहानी आगे बढाई.
हाँ तो ये उस ज़माने की बात है जब मैं नहीं था,आप नहीं थे,ये शहर भी नहीं था.तो इस बार शहर बनने की कहानी सुनिए.
हॉल के अँधेरे से एक बहुत तेज़ आवाज़ आई,
नहीं हमें शहर की कहानी नहीं सुननी है,आप उसी कहानी को आगे बढाओ जो आप सुना रहे थे.
अच्छा!ठीक है,बूढ़े दास्तानगो ने बहुत इत्मिनान से ये कहा.
एक दिन का वाक्य बड़ा अजीब है,ये बात उसी वक़्त की है जब दूर दराज़ का सफ़र तय कने के बाद शहज़ादा अपने महल की तरफ आ रहा था,शहजादे के आने की ख़बर महल में पहले ही पहुँच चुकी थी,महल के रास्ते में रंग बिरंगे दिए जलाये गए थे.

कहानी जारी है...