(ये कहानी हर उस इंसान की है जिसने अपने वजूद का लंबा सफर तय किया है और करता रहेगा.)
ज़माना गुज़र गया और उन बीत गये सालों में कभी कभी ऐसा वक़्त भी आया की एक पल में न जाने कितनी कहानियां लिख दी गयी.पीछे लौट कर जाना कौन चाहता है और अगर वापस जा कर कहानी लिखने वालों को कोई एक सिरा पकड़ में आ भी जाता है तो क्या हो जायेगा.वक़्त की अपनी एक शक्ल होती है जो हमारी ज़िन्दगी के आईने में झाँक कर मुस्कुराता है,उसी मुस्कुराहट की रौशनी में हमारी आँखों का अँधेरा गुम हो जाता है.हालांकि उस रौशनी के झमाके में आँखों का दिया तो रोशन हो जाता है लेकिन अपना वजूद बहुत सारी लकीरों में बंट कर कई सिम्तों में बिखर जाता है.

ज़माना गुज़र गया और उन बीत गये सालों में कभी कभी ऐसा वक़्त भी आया की एक पल में न जाने कितनी कहानियां लिख दी गयी.पीछे लौट कर जाना कौन चाहता है और अगर वापस जा कर कहानी लिखने वालों को कोई एक सिरा पकड़ में आ भी जाता है तो क्या हो जायेगा.वक़्त की अपनी एक शक्ल होती है जो हमारी ज़िन्दगी के आईने में झाँक कर मुस्कुराता है,उसी मुस्कुराहट की रौशनी में हमारी आँखों का अँधेरा गुम हो जाता है.हालांकि उस रौशनी के झमाके में आँखों का दिया तो रोशन हो जाता है लेकिन अपना वजूद बहुत सारी लकीरों में बंट कर कई सिम्तों में बिखर जाता है.

सर्द मौसम में अलाव जलाया जाता था,बच्चे ने इस बात पर इतनी ज़ोर का क़हक़हा लगया की बूढ़े सख्स ने उसे बहुत ध्यान से देखा और ये समझने की कोशिश कर ही रहा था की आखिर बच्चे को हंसी क्यों आई कि उसकी माँ आ गयी.बच्चा अभी अभी स्कूल से आया था और अपने बैग से पानी की बोतल निकाल कर पीना ही चाहता था.बच्चा अपनी माँ के साथ चला गया और बुढा सख्स उसे तब तक जाते हुए देखता रहा जब तक बच्चे की धुंधली काया एक पतली सी लकीर में नहीं बदली.
बुढा खामोश हुआ तो हॉल
में रौशनी के तमाम बल्ब रोशन हो गए.बूढ़े ने देखा हॉल में एक भी सीट ख़ाली नहीं
थी.पानी का एक ग्लास बूढ़े के बिलकूल सामने था,बूढ़े ने पानी पिया और अपनी आँखें बंद
कर के कहानी याद करने लगा.आजकल बुढा सख्स कहानी भूल जाता था,कई बार तो उसे अच्छा
भी लगता था कि चलो अब सब कुछ भूल ही जाना चाहिए.इस वक़्त भी बूढ़े को ये अच्छा लग
रहा था.
अरे क्या हुआ
कहानी सुनाओ!


हॉल में एक शोर हुआ और बूढ़े के सर के ठीक पीछे एक बल्ब रोशन हुआ.इस बल्ब को उस वक्त ही रोशन किया जाता था जब दास्तानगो कहानी कहते कहते रुक जाता था.कई बार बूढ़े को बहुत हंसी आती थी,दास्तानगो को पता था इस बल्ब की रौशनी में पीछे जा कर कहानी को तलाश करना नामुमकिन है.
बल्ब ऑफ हुआ और बूढ़े ने
कहानी आगे बढाई.
हाँ तो ये उस ज़माने की
बात है जब मैं नहीं था,आप नहीं थे,ये शहर भी नहीं था.तो इस बार शहर बनने की कहानी
सुनिए.
हॉल के अँधेरे से एक बहुत
तेज़ आवाज़ आई,
नहीं हमें शहर की कहानी
नहीं सुननी है,आप उसी कहानी को आगे बढाओ जो आप सुना रहे थे.
अच्छा!ठीक है,बूढ़े
दास्तानगो ने बहुत इत्मिनान से ये कहा.
एक दिन का वाक्य बड़ा अजीब
है,ये बात उसी वक़्त की है जब दूर दराज़ का सफ़र तय कने के बाद शहज़ादा अपने महल की
तरफ आ रहा था,शहजादे के आने की ख़बर महल में पहले ही पहुँच चुकी थी,महल के रास्ते
में रंग बिरंगे दिए जलाये गए थे.
कहानी जारी है...
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